शाकाहार ओर आध्यात्मिकता

"सबसे ज्यादा दयालु उन लोगों पर दया करते हैं, जो दूसरों की प्रति दया रखता हो। पृथ्वी वासियों पर दया का भाव रखो, और वह जो जन्नत से परे है, तुम पर दया करेगा।"

- पैगंबर मुहम्मद

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"शाकाहार से बढ़कर ऐसा कोई खाना नहीं है जो मनुष्य के शरीर को लाभ पहुँचाता हो और साथ ही साथ पृथ्वी पर जीवन को बचाए रखने में सहायक और उन्नतिकारक हो|

- एल्बर्ट आइनस्टाइन

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"जब मनुष्य माँस खाता है, तब वह उस जीव के गुणों को भी ले लेता है जिसे वह खा रहा है, और एक बार ऐसे गुण अंदर प्रविष्ट हो जाएँ तो मनुष्य में क्रोध, जल्दबाज़ी और उसके पाशविक गुणों में बढ़ोतरी होती है। अगर वह अंदर कुछ न मारे तो वह बाहर भी कुछ मार नहीं पाएगा। 

- बाबा मुहायुद्दिन

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“कोई भी जीव इस बात से महान नहीं हो जाता कि वह किसी को हराता है या किसी भी जीव को कष्ट देता है। वह महान तब बनता है जब वह अपने आपको हराने और प्राणियों को कष्ट देने से रोके।"                                                               

- गौतम बुद्ध 

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"एक समय ऐसा आएगा जब मेरे जैसा मनुष्य, जानवरों की हत्या को भी मनुष्य की हत्या जैसे जघन्य देखेगा।

 - लिओनार्दो दा विंसी

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 "मैं समझता हूँ कि आध्यात्मिक उन्नति इस बात की माँग करती है कि हम अपने शारीरिक सुखों के लिए अपने सह-प्राणियों की हत्या बंद करें"

- महात्मा गांधी

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और ईश्वर ने कहा, "देखो! मैंने तुम्हारे लिए इस धरती पर ऐसे बीज दिए हैं जो जड़ी-बूटी देंगे और हर पेड़ से जो फल मिलेंगे उनमें भी बीज मिलेंगे जो तुम्हारा खाना होगा।’’                                                                            

- जीसस

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"माँसाहार और शाकाहार में बुनियादी फ़र्क इस बात का है कि वे कितने ज़्यादा सूर्य के प्रकाश से युक्त हैं। फल और सब्जियाँ सूर्य के प्रकाश से इतनी सराबोर होती हैं कि हम कह सकते हैं कि वे सघन प्रकाश के रूप हैं। अपने दिल के गुणों को विकसित करने के लिए शांति से खाने के साथ-साथ, विवेक पूर्वक खाना खाना भी आवश्यक है।"

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"इसका अर्थ हुआ प्रकाश को अपने जीवन में लाना। सघन प्रकाश को ग्रहण करना, जिसमें सुंदर ध्वनियाँ निहित हैं जो हमारे हृदय को ब्रह्मांड की तरंगों और अनदेखी पहलुओं से जोड़ती हैं। यह पदार्थ के प्रदीप्त गुणों को आकर्षित करती हैं और आपके अस्तित्व को प्रदीप्त करती हैं, प्रबुद्ध करती हैं; विशेषतौर पर आपकी सोच और भावनाओं को। यह केवल आज के लिए नहीं, बल्कि इस भूलोक में आपके रहने तक आपके सभी अनुभवों में आप इस दीप्तता को महसूस कर पाएँगे।      

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आपका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आप कैसे खाते हैं और क्या खाते हैं। आपका शरीर एक मंदिर है और इस मंदिर में होने वाले प्रत्येक कार्य, जिसे एकाग्र चेतना से किया गया हो, एक सुव्यवस्थित परिणाम देता है। जब आप पुरानी और सीमित कण, जो आपसे इस परमानंददायक ब्रह्मांड के अनुभवो को छुपा देता है, उन्हें बेहतर और परिष्कृत कणों से बदल देने पर आप उत्कृष्टता को पा लेंगे। 

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आपके भोजन के गुण, उसके भौतिक गुणधर्म न सिर्फ़ आपकी भावनाओं और मन पर प्रभाव डालते हैं, बल्कि वास्तव में वे आपकी शक्ल-सूरत और व्यक्तित्व को भी बदल सकते हैं। हमारे आसपास की सभी वस्तुएँ शक्ति से व्याप्त हैं और ये शक्तियाँ जब इस भूलोक पर विद्यमान प्रकाश के उन्नत स्तर पर पहुँचती हैं तो और अधिक शुद्ध और प्रखर होती चली जाती हैं।            

(समारा फाउंडेशन से साभार)

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