पिरामिड  स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेन्ट के 18 आदर्श सूत्र

1. ध्यान के सही विधान को अपनाएं

स्वास लेने का सही तरीका है "आनापानसति"। ’आन’ का मतलब स्वास लेना है, ’अपान’ का स्वास छोड़ना और ’सति’ का अर्थ में रहना, होता है।

’आनापानसति ध्यान का तरीका सबसे आसान है- बील्कुल सहज, सरल और आसान। सभी के लिए, चाहे वह योगी हो, व्यवसायी हो या कार्मिक। वे कहीं भी ध्यान में बैठ सकते हैं, कहीं भी अपने ध्यान में रम सकते हैं, ध्यान का आनंद ले सकते हैं। आपको किसी गुरू की आवश्य़कता नहीं है। आपको सीखने के लेए कहीं जाना नहीं है।

केवल अपने आपमें डूब कर, ध्यान का आनन्द लेकर, अपने में ही मस्त रहना है।

 

2. आध्यात्म की सही पुस्तकें पढ़ें

ध्यान के दौरान बहुत लोगों ने अनेक दृश्य देखॆ हैं, अलौकिक अनुभव किए हैं। यदि आपको ऎसे अनुभव हुए हों तो नेश्चय ही आपकी यात्रा आसान हो जाएगी। ऎसी प्रेरणाएं आपके लिऎ बहुत लाभदायक हैं। आपके लिए ध्यान मार्ग ही शक्तिशाली है। ध्यान मार्ग में सही ग्नान देने वाली आध्यात्मिक पुस्तकें रास्ता दिखाने में पथ प्रदर्शक होती है। ध्यान की गहराइयों को समझने के लिए आध्यात्मिक पुस्तकें हमारी मार्गदर्शक हैं।

 

3. ध्यानानुभव व ज्ञानियों के पुस्तक ज्ञान को परस्पर बांट लें

ध्यान के अनुभव, ज्ञानियों के पुस्तक-ज्ञान को परस्पर बाँट लें। यह शक्ति ईश्वरीय है। बाँटने से बहुत कम चीजों में बढ़ोत्तरी होती है। इस दुनिया में जो भी पदार्थ या वस्तु हम देते हैं, वह घटती है। लेकिन ध्यानानुभव जितना बांटोगे उतना बढ़ता जाएगा। आपका हाथ कभी खाली नहीं होगा, वह हमेशा भरा रहेगा। यह ईश्वरीय शक्ति है जो आपको और सबको आनन्द देती है।

 

4. मौन का पालन करें

पिरमिड स्पिरिचुअल सोसाइटीज़ मूवमेन्ट के  आदर्श सूत्र में सबसे अच्छा और सरलतम सूत्र है-मौन रहना। बेकार की बातों में न उलझाना, कम बात करना। मितभाषी बनो, मृदुभाषी बनो, मीठा बोलो, कम  बोलो, शांत रहो। बोलने से हमारी ऊर्जा कम होती है। हम जितना कम बोलेंगे, उतनी ऊर्जा हममें विकसित होगी।

 

5. पूर्णिमा ध्यान करें

पूर्णिमा की रात में ध्यान करने से कुछ और अलग अनुभव होता है। जहाँ आपके बीच मास्टर बैठो है, वहाँ निश्चय ही आपका अनुभब भिन्न होगा। उस समय सबसे शक्तिशाली ऊर्जा आपके शरीर और मन से प्रवाहित होकर, पूर्णमा के दिन, आपको आनंदित करेगी जो अन्य दूसरे दिनों में प्राप्त नहीं हो सकती।

 

6. पिरामिड ऊर्जा का विशेष उपयोग करें

पिरामिड में ऊर्जा का सबसे शक्तिशाली संवाहन होता है। पिरामिड में चारों तरफ से ऊर्जा का एकीकरण होता है। जो ध्यान पिरामिड के बाहर 30 मिनिट में लगता है, वही ध्यान पिरामिड के भीतर 10 मिनट में लग जाता है। पिरामिड लकड़ी, एस्बेस्टस, टीन या कंक्रीट किसी भी धातु से विशेष तरह से डिज़ाइन कर, घर पर ही बनाया जा सकता है।

 

7. एलोपैथी दवाइयों का सेवन कदापि न करें

एलोपैथी दवाइयां जिनका इस्तेमाल हम शरीर की बीमारी ठीक करने के लिए करते है, इससे बीमारी दब जाती है, वह जड़मूल से नष्ट नहीं होती। आज नहीं तो कल वह फिर से उभर सकती है। इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा को अपनायें और ध्यान के माध्यम से शरीर को स्वस्थ रखें। इस दिनचर्या को अपनाकर आप स्वस्थ रहेंगें।

 

8. माँस भक्षण कदापि न करें

मांसाहार निश्चित ही आहार नहीं है। पशुओं को मारकर खाने से हमारे अन्दर अच्छी भावनाएं कभी भी पैदा नहीं होंगी। हर प्राणी में आत्मा है, हम इसे न भूलें। मांस भक्षण कभी भी न करें। शाकाहारी बने रहें। हर जीव-आत्मा से प्रेम पूर्ण व्यवहार करें। ज़्यादा खाने के लिए जीना, यह आदत ठीक नहीं है। लगातार भॊजन करने से शरीर में विकार पैदा होते है, हानि पहुंचती है। सीमित आहार, जितना जरूरी है, उसके कम ही खाए, तो ठीक होगा। दो रोटी की भूख हो तो एक ही खायें। इससे शरीर में पाचन शक्ति बढ़ती है और ऊर्जा का विकास होता है। अनावश्यक स्वादिष्ट भोजन का सेवन कर और मादक द्रव्यों का उपयोग कर शरीर को रोगी न बनाएं।

 

9. प्रकृति से आनंद लीजिए

हमारा जीवन, प्रकृति की निकटता में ही आनंद्पूर्ण रहता है। समुद्र, नदी, तालाब, पहाड़ और जंगलों के किनारे हमें विश्वशक्ति का भरपूर भंडार मिल सकता है। इसलिए प्रकृति से हम अधिक आनंद प्राप्त कर सकते है। प्रकृति हमारे लिए संजीवनी है। यह ईश्वर से प्राप्त अमृत है। इसलिए प्रकृति के साथ और ध्यान के साथ जीवन बिताएं।

 

10. किसि विशेष आध्यात्मिक वस्त्रों को धारण न करें

स्वयं को ध्यान में लगाने के लिए आप खास तरह के वस्त्र पहनते हैं। इसमें किसी तरह का आध्यात्मक वस्त्र धारण नहीं करना है, कोई कंकर-पत्यर, नग भी हमें धारण नहीं करना है। न ही कोई विशेष चिहन धारण करना है। ध्यान तो श्वास के साथ विधमान है। हमें श्वास में ही आनंद मिल जाता है। इसके लिए किसी प्रकार के विशेष वस्त्र धारण करने की जरूरत नहीं है।

 

11. बाल्यकाल से ही बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा दें

ध्यान तो बचपन से ही सिखाया जा सकता है। यह ऎसा साधन है जो बच्चों को भी सही रास्ता दिखा सकता है। इसमें किसी उम्र का बंधन नहीं है। यदि आप ध्यान साधना की आदत बचपन से ही डालनी जरूरी है। इससे बच्चों का मानसिक विकास होगा, वे उस्ताही बनेंगे।

 

12. शिष्य न बनकर सभी मास्टर्स ही बनें

शिष्य परम्परा हमारे अंदर कमज़ोरी पैदा कर देती है और हम केवल गुरु की तरफ देखते हैं, उन पर आश्रित हो जाते हैं। शिष्य न होकर आप गुरु बनने आगे बढ़े, आपने ही अभ्यास से आप स्वयं मास्टर बन जाएंगे। ये सब शक्तियां आप में मौजूद हैं, निहित है, उन्हें केवल जानना है। केवल समझना है कि आप मास्टर है। यदि आप ध्यानि बन जाएंगे तो आप अपने मास्टर भी बन जाएंगे।

 

13. ध्यान कि शिक्षा देने में धन का लेन-देन न करें

ध्यान शिक्षा देने की क्रिया को धन या व्यापार का स्वरूप न बनने दें। ध्यान प्रचार के लिए किसी तरह का व्यापार जरूजी नहीं है। ध्यान प्रचार मार्ग ही दान का सहज एवं उत्तम मार्ग है।

 

14. मूर्ति पूजा एवं व्यक्ति पूजा न करें

किसी मूर्ति के पूजक न बनें। हमें मूर्तियों ने बांट रखा है। किसी व्यक्ति विशेष की पूजा करने की बिल्कुल जरूरत नहीं। केवल ध्यान को अपनाइये, केवल अपने ही ध्यान में रमिये। अपने ही ध्यान में आनंद लीजिए। अपने में ही अनुभव पैदा कीजिए और अपने रास्ते का खुद निर्माण कीजिए। यदि इस रास्ते पर आप चलेंगे तो आपकी समस्याओं का निराकरण भी स्वयं हो जायेगा।

 

15. ध्यान की ऊर्जा से अपनी सब समस्याओं का निवारण स्वयं करें

सारी समस्याओं का निवारण स्वयंमेव हो जाता है। आपको  प्रश्न पूछने के लिए बाहर जाना नहीं है। जवाब आपके भीतर ही मिल जाते हैं। क्या करना है, क्या नहीं करना? इसकी जानकारी भी आपको स्वयं मिल जायेगी। केवल ध्यान में बैठना जरूरी है, फिर ये सारे प्रश्न स्वयं ही हल होने लगेंगे।

 

16. गृहस्थ जीबन बिताते हुए जीवन मुक्ति पायें

ऎसा बिल्कुल नहीं है कि आप यदि समाज में है तो समाज से हट जायें। गृहस्थ है तो गृहस्थी छोड़ दें, पहाड़ों में चले जायें। समाज को भूल जायें। ऎसा कायर लोग करते हैं। समाज से भाग कर, गृहस्थ जीवन से हटकर जीना, जीवन के लिए जरूरी नहीं है। जहां हैं वैसे ही रहें, समाज को अपनाएं, स्वयं के कार्यॊं को अच्छे ढंग से पूरा करें। जीवन-मुक्ति के लिए इन सबमें तपना आवश्यक है। ऎसे प्रयास करें कि आपका यह जन्म अंतिम हो।

 

17. ध्यानानुभवों को सदा ग्रंथस्थ करें

अपने ध्यानानुभवों को ग्रंथ्स्थ करें। ध्यान में आपको जो भी अनुभव आयें उनको लिखें। जितना आप लिखेंगें, वह उतना ही लोगों के काम आयेगा। आपके अनुभव यदि आप तक ही सीमित रहेंगे तो, लोग उससे लाभ नहीं उठा पायेंगे। इसलिए आप अपने ध्यानानुभवों को लेखनी के द्वारा ध्यानेयों के हृदय तक पहुंचाइये।

 

18. सभी गांवों में, सभी शहरों में पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटी की स्थापना करें

सभी गांवों में, शहरों में पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटी की स्थापना करना और अनेको आगे बढ़ाना है। जितना आप लोगों को समझायेंगे, जितना आप लोगों के बीच जायेंगे, उतनी ही लोगों में ध्यान के प्रति रुचि जागेगी। यही पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटीस मूवमेन्ट का उद्देश्य है।

पिरामिड स्पिरिचुअल सोसायटीस मूवमेन्ट के 18 आदर्श सूत्र आपको मार्गदर्शक रूप में मिले हैं। आप मास्टर्स के रूप में इनका अनुसरण करें, ध्यान के रास्ते में आगे बढ़ने के लिए किसी तरह का बंधन नहीं है। आप स्वयं निर्माण करें। स्वयं अपने क्षेत्र को बढ़ायें। आपका रास्ता ध्यान में ही मिल जायेगा। योगीराज ब्रह्मर्षि पत्रीजी ने जिस विशाल ग्लोबल मूवमेन्ट की परिकल्पना की है वह आदर्श भारत,’ध्यान भारत’ का निर्माण करेगी।

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