सवाल जवाब

 : " ‘ध्यान’ " में क्या होता है? "

पत्रीजी : ध्यानाभ्यास साधना में हमारा दिमाग जब शून्य होता है, तब धीरे - धीरे विश्वशक्ति हमारी ओर बहना शुरू होती है। साँस के साथ रहते समय एस्ट्रल मास्टर्स प्रत्यक्ष होकर अपनी शक्ति हमें देते हैं। वे नहीं चाहते कि हम उनकी पूजा करें या प्रार्थना करें परन्तु स्वयं प्रकाशित मास्टर्स बनने के लिए उन्नति चाहने के लिए हमारे प्रति वे बहुत प्रसन्न रहते हैं। ध्यान में निर्विचार स्थिति में बच्चों की तरह रहने वाले हमें एक ‘माँ’ की तरह एस्ट्रल मास्टर्स भी अपनी शक्ति हमें देते रहते हैं। यह परम सत्य है। 

 : " ‘आध्यात्मिकता’ का मतलब क्या है? "

पत्रीजी : यह बात समझना ही ‘आध्यात्मिकता’ है कि " हम ईश्वर के पास से आये हुए भगवान ही हैं। ...हम ईश्वर द्वारा बनाए गए देवता हैं। " इस महान सत्य को समझने के लिए भौतिक जीवन में हमें सदा जो काम करना है वह है " कडा ध्यानाभ्यास। " 

पानी में डूबने से... स्नान
श्वास में डूबने से... ध्यान
सत्य में डूबने से... ज्ञान

 : कर्मयोग के बारे में दिए गए आप के एक भाषण में मैंने सुना है कि हमें अपनी आत्मा की अवस्था के अनुसार कर्म करते रहना चाहिए (उदाहरण - शैशवात्मा, बालात्मा, प्रौढ़ात्मा, विमुक्तात्मा तथा परिपूर्णात्मा के अनुसार ही हमें कर्म करना चाहिए) " अब मेरा प्रश्न है कि " हम अपनी आत्मा की अवस्था को कैसे समझ सकते हैं? "

पत्रीजी : ‘ध्यानाभ्यास’ शुरू करने के बाद ही सब लोग अपनी आत्मा की अवस्था को खुद समझ सकेंगे। यदि आप अपने जीवन ध्येय को नहीं समझ सके तो आप एक ‘बालात्मा’ हैं। ध्यान से पहले हर एक आत्मा बालात्मा की स्थिति में होती है। किसी भी स्थिति में हों, पहले ‘ध्यान करना’ शुरू कीजिए। धीरे - धीरे आप खुद अपनी स्थिति को समझ सकेंगे और एक एक कर के सभी अवस्थाओं को पार कर लेंगे।

 : ‘पिरामिड’, ‘क्रिस्टल’, ‘क्रॉप सर्किल’ आदि के आधार पर जीना एक मास्टर के लिए कितना आवश्यक है?

पत्रीजी : एक मास्टर के लिए किसी की मदद नहीं चाहिए। जब हम खुश और स्वस्थ रहते हैं तब किसी की मदद के बिना सडक पार कर सकते हैं लेकिन एक बच्चे, बूढ़े या बीमार आदमी को सड़क पार करने के लिए दूसरों की मदद अवश्य चाहिए।

शुरू में और कडी परेशानियों में रहने वाले मास्टर्स के लिए भी मदद अवश्य उपलब्ध है परन्तु उन के कहने पर ही| मदद के रहने पर भी अज्ञान या अहंकार के कारण यदि वह उनका उपयोग नहीं करता तो वह बेवकूफ़ है। जब दूसरों की मदद लेनी है तो अवश्य लीजिए परन्तु विनम्रता पूर्वक और उसका धन्यवाद भी कीजिये|

सड़क पार करने के लिए जैसे कोई मदद करता है, वैसे ही पिरामिड शक्ति, सामूहिक ध्यान शक्ति, पूर्णिमा की ध्यान शक्ति, प्रकृति की शक्ति, क्रिस्टल शक्ति आदि सबकी मदद लेकर उनके प्रति हमें कृतज्ञ रहना चाहिए। आप एक ‘ध्यानी’ हैं या नहीं, एक ‘मास्टर’ हैं या नहीं ... उपयोगी चीजें सबकी मदद करती रहती हैं।

 : ‘अहं’ का मतलब क्या है? उसे कैसे पहचानेंगे?

पत्रीजी : हम सबको यह ‘परम सत्य’ जानना चाहिए कि इस दुनिया में ‘अज्ञान’ है, परन्तु " अहंकार " बिलकुल नहीं है। अपने अंदर ... अंतरात्मा में... सभी स्वच्छ तथा भोले - भाले ही हैं। परन्तु समाज के सामने वे अहंकारी के रूप में अभिनय करते रहते हैं।

हमारे पिरामिड साहित्य में कभी भी हम ‘अहंकार खो जाने’ शब्द का उपयोग नहीं करेंगे। आँखें बंदकर साँस पर ध्यान रखते हुए, अंतर्मुख हो कर बैठें और इसकी आदत बनायें|

 : बीती हुई जिंदगी की पीड़ाओं को हम कैसे भूल सकेंगे?

पत्रीजी : नये लोगों से दोस्ती करें।

 : आत्मा का मूल और मंज़िल यदि एक ही है तो उसके इतने जन्म और इतने शरीर क्यों?

पत्रीजी : हर एक जन्म भी आत्मा को कई अनुभव देता है। शायद वह अच्छा हो या बुरा... वह अनुभव आत्मा को सुसंपन्न बना देता है। एक आत्मा जब आत्मा के रूप में अपनी जिंदगी शुरू करती है, तब वह बिलकुल साफ भोली भाली, स्वच्छ रहती है। आखिर जन्म - जन्मों के अनुभव से पकी हुई वह आत्मा... स्थित प्रज्ञत्व स्थिति में रहते हुए... निर्वाण स्थिति को प्राप्त करती है। इसीलिए आत्मा अनेक भौतिक व्यवस्थाओं से भरे अनेक भौतिक शरीर धारण करती रहती है। अतः आत्मा की मंज़िल है अधिकतम अनुभव और आत्मा का मूल है अनुभवशून्यता। 

: इस अहं को दूर करके अपने अन्दर शान्ति, सामंजस्य, क्षमा, करुणा आदि गुणों को किस प्रकार पाया जा सकता है या वह सिर्फ ऋषियों को ही साध्य होगा?

पत्रीजी : कृपा करके व्यर्थ बातें न करके ज्यादा ध्यानाभ्यास कीजिए। 

 : ‘ज्ञान’ का मतलब क्या है?

पत्रीजी :

‘ध्यान’ के द्वारा 30% प्रत्यक्ष ज्ञान को हम प्राप्त करते हैं।
‘स्वाध्याय’ से 35% परोक्ष ज्ञान को...
‘सज्जन सांगत्य’ से फिर 35% परोक्ष ज्ञान को हम प्राप्त करेंगे।

यह प्रत्यक्ष तथा परोक्ष ज्ञान हमें मुक्ति देते हैं।
‘ज्ञानान् मुक्तिः’ है, न।

स : "मानव में जाति-भेद क्यों है"?

पत्रीजी: "मानव में जाति-भेद उनकी मूर्खता से आता है। मनुष्य एक जन्म में मुसल्‌मान और एक में क्रिश्चियन, एक बार स्त्री, एक बार पुरुष बनकर पैदा होता है लेकिन पैदा होने के बाद उसे भूलकर मैं मुसल्‌मान, मैं क्रिश्चियन समझते हुए अपनी परंपरा को भूल जाता है। जाति-पाँति के भेद-भाव में फँस जाता है। इसलिए अपनी जन्म परंपरा को समझने के लिए ध्यान करना चाहिए।"

स : "पूर्वजन्म के बारे में विवरण दीजिए।"

पत्रीजी: "तुम पहले ध्यान करो। बाद में तुम्हें समझ आएगा। तुम ने पूछा है, इसलिए मैं अपने पूर्वजन्म के बारे में कह रहा हूँ। इस जन्म में मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूँ। एक जन्म में गोल्कोंडा में सूफी संत बनकर पैदा हुआ था। एक बार उड़ीसा में पैदा हुआ था। एक जन्म में बेंजामिन फ्रेंक्लिन बनकर पैदा हुआ था।"

स : "क्या ध्यान सिर्फ बड़ों के लिए है या विद्यार्थियों को भी उपयोगी है?"

पत्रीजी: "ध्यान से सब को लाभ होता है। संगीत, क्रिकेट, फुट्बाल की तरह ध्यान को भी बचपन से ही सीखना चाहिए। चौदह(14) साल की उम्र में ही विवेकानंद अपने गुरु की तलाश में निकले थे। हनुमानजी ने दो वर्ष की आयु में ही ध्यान करना शुरू किया था। सभी को बचपन से ही ध्यान को शुरू करना चाहिए।"

स :  "श्वास पर ध्यान रखने से स्वास्थ्य ठीक होता है। यह कैसे संभव है?"

पत्रीजी: "श्वास में शक्ति है। इस माइक में जैसे बिजली है वैसे श्वास में शक्ति है। वह शक्ति जन्म से ही तुम्हें उपलब्ध है। उस शक्ति से रोगों का उपशमन होता है। श्वास तो जन्म से ही है। उस के ऊपर गमन रखने से श्वास की शक्ति हमें उपलब्ध होती है।"

स : "शाकाहारी भी पेडों को मारकर ही खाते हैं ना?"

पत्रीजी: "यह पहले से ही तय है कि कौन-कौन से जीवों को क्या खाना चाहिए। मानव का शरीर शाकाहार खाने के लिए अनुकूल है। इसलिए मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। तुम मांसाहार का सेवन कर सकते हो लेकिन नहीं करना चाहिए। मांसाहार पापाहार है। पाप अर्थात रोग।"

स : "कहते हैं कि पिछले जन्म के पाप-पुण्यों का परिणाम ही इस जन्म में रहता है। दरअसल हम जिस काम को करते हैं वह हमारे परिश्रम का फल ही होता है न कि पिछले जन्मों का परिणाम|"

पत्रीजी:  "पिछले जन्म के कर्म फल ही इस जन्म में भी आते हैं| कल की गई गलती की आज जिस प्रकार सजा मिलती है, आज लिखी हुई परीक्षा का परिणाम दो महीने बाद जिस प्रकार मिलता है, उसी प्रकार पिछले जन्म के कर्मों का फल इस जन्म में प्राप्त होता है। इस प्रस्तुत जन्म में जिस प्रकार आज और कल हैं, उसी प्रकार हमारे शाश्वत जीवन में यह जन्म और पिछले जन्म हैं। इन सब को पूर्णतः समझने के लिए अच्छी तरह ध्यान करना चाहिए।"

स : ध्यान नहीं लगता क्या करें?

पत्रीजी: ध्यान कोई नई घटना नहीं है। ध्यान हमारा स्वभाव है, ध्यान हमारी अंतस् सत्ता है। यह कठिन नहीं, हम ध्यान को कठिन बना लेते हैं। किसी बात से संघर्ष खड़ा करके हम सोचते हैं कि वह हमारी मुक्ति में बाधक है, या हम किसी ऐसी बात की खोज में लग जाते हैं, इस आशा के साथ कि वह हमें मुक्ति प्रदान करेगी। वास्तव में ध्यान फलित होता है - हम जो हैं, उसमें विश्रामपूर्ण होने से - जीवन की हर श्वास के साथ रहने से।

स : इस आपाधापी वाली ज़िन्दगी में कैसे तनावमुक्त रहें?

पत्रीजी: ‘‘अभी और इस पल’’ पल-पल को जिओ, ऐसे कि इस पल को बेहतर बना दो। ना तो अतीत की स्मृतियों के बोझ में जीना, न भविष्य की कल्पनाओं में जीना। ‘‘खाते समय बस खाना है, उसमें तल्लीन रहो। सोते समय सोना है, चलते समय केवल चलना है। उस क्षण से आगे पीछे मत उछलो। मन का स्वभाव है या तो आगे-आगे चलता है या पीछे घिसटता रहता है। यह कभी वर्तमान क्षण में नहीं होता, हम समग्रतापूर्वक कैसे जी सकते हैं जब मन स्वयं के साथ ही बड़बड़ा रहा हो। बड़बड़ाते मन को शांत करने के लिए ‘ध्यान’ ही एकमात्र उपाय है। ध्यान से मन एक उपयोगी उपकरण बन जाता है। परंतु ध्यान के अभाव में मन अपने शोरगुल से हमें गुलाम बनाए रखता है। आनापानसति ध्यान ... अपना पूर्ण ध्यान एवं चेतना केवल अपने सहज श्वास प्रक्रिया में बनाये रखें ।

स : पिरामिड ऊर्जा का प्रयोग क्यों करें?

 पत्रीजी: राम से बात करने के लिए हमें राम का नम्बर चाहिए तभी फोन पर बात-चीत संभव है, अगर श्याम का नम्बर मिलाया तो बात-चीत असंभव है। इसी तरह पृथ्वी का कोड नम्बर है ‘पिरामिड ऊर्जा’ - पिरामिड जो एक खास कोण में बनाया जाता है जिसका प्रयोग करने से हमें कॉस्मिक ऊर्जा मिलती है, इसी कॉस्मिक ऊर्जा के द्वारा हमें तन की स्वस्थता, मन की शांति और अनेक आध्यात्मिक अनुभव होते हैं।

स : ध्यान के लिए 40 दिन का ही निरंतर अभ्यास ज़रूरी क्यों?

पत्रीजी: दम और सम। शरीर को स्थिर आसन में बैठने की आदत नहीं है, मन की चंचलता उसे सदैव हलचल में रखती है। निरंतर अभ्यास के द्वारा आसन स्थिर होता है और मन की तरंगें शांत होकर स्थिर मन का सृजन करती हैं। जब मन पूरी तरह विचार शून्य हो जाता है, तो विश्व शक्ति शरीर में भरना शुरू हो जाती है। एक बार ध्यानाभ्यासी को निरंतर अभ्यास करना ही होगा तभी गहन ध्यान संभव हो सकेगा।

ध्यान भारत
नवयुग की आध्यात्मिक द्वैमासिक पत्रिका

Dhyan Bharat

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पत्रीजी संदेश

हर व्यक्ति अपना "परमात्मा" स्वयं ही होता है!

ध्यान के लिए दान सर्वोच्च दान है

- ब्रह्मर्षि पत्रीजी

नित्य अन्नदान सेवा के लिए पिरामिड वैली इंटरनेशनल, बेंगलुरु

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