ब्रह्मर्षि पत्रीजी

मेरा नाम सुभाष है, वंश का नाम पत्री है। निज़ामाबाद डिस्ट्रिक्ट बोधन, आन्ध्रप्रदेश में मेरा जन्म हुआ। अपने जन्म को हम खुद चुनते हैं। इसी तरह मै अपने माता-पिता, स्थान, सब चुनकर पैदा हुआ।

1966-1970 के बीच में मैने कृषि विज्ञान में स्नातक, 1970-1974 तक कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर पूरा करके हैदराबाद में Indian Council of Agricultural Research में एक साल तक शोध किया |

तीन बार I.A.S. के लिए पढ़ाई की, हर बार साक्षात्कार के लिए दिल्ली गया। एक साल मैने इन्कम टैक्स इंस्पेक्टर के रूप में काम भी किया। उसके बाद Coromandel Fertilizers Ltd. से लेकर Senior Agronomist के पद तक काम किया। Regional Marketing Officer के पद पर 18  साल तक काम किया।

इस भौतिक जीवन में भौतिक शास्त्र के पदार्थ विज्ञान के साथ ही मुझे आध्यात्मिकता में भी रूचि थी।

बचपन में रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन के बारे में सुना था, मुझे एक सिहरन सी होती थी। पहली किताब मैंने आठ साल की उम्र में पढ़ी थी। वह किताब है-महात्मा गांधी की 'My Experiments with Truth' । 15 साल की उम्र में डा.सर्वेपल्ली राधाकृष्णन द्वारा लिखी Indian Philosophy को पढ़ा। उसके अगले 10 साल तक मैंने अंग्रेजी साहित्य खूब पढ़ा। शेक्सपियर, मिल्टन से लेकर डिक्कन्स तक...टाँलस्टाँय, डोस्टोवस्की से रवीन्द्र नाथ टैगोर की 'गीतांजलि' तक, सौ से भी ज्यादा साहित्य पढ़ा। तेलुगू में विस्तार से हज़ारों किताबें पढ़ीं लेकिन बहुत कम हिन्दी किताबें पढ़ीं।

मेरे प्यारे दोस्तो! मैंने महान संगीत गुरुओं के पास संगीत सीखा है। 1963  से 1970 तक श्री टी.एस. चंद्रशेखरन के पास बाँसुरी बजानी सीखी। उसके बाद 1975  से 1978  तक करनूल में पद्मभूषण डॉ. श्रीपाद पिनाकपाणी के पास बाँसुरी वादन सीखा। बचपन से क्रिकेट मेरी जान है। हमेशा टीम को बनाना, रविवार को मैच रखना मेरा शौक रहा है। मैं टेबिल-टेनिस, शतरंज, कैरम और ताश बहुत अच्छा खेल लेता हूँ ।

यह सब कुछ करता था, पर आदमी क्यों जी रहा है यह मुझे समझ नहीं आता था और इसमें शंका बनी रहती थी। कुछ भी हो, ध्यान जब तक हमारी ज़िन्दगी में नहीं आता तब तक कुछ पता नहीं चलता। घर, पत्नी, पति, बच्चों के होते हुए भी, कभी-कभी लगता है कहीं कुछ कमी है। कुछ मिलना बाकी है। जब हम ध्यान में आते हैं, अध्यात्म में आते हैं तो सब कुछ ठीक लगने लगता है, वह रिक्तता पूरी होने लगती है।

जो पति पहले सही नहीं लगता था अब  सही लगता है, जो पत्नी पहले सही नहीं लगती थी वह भी सही लगती है। बच्चे और सभी चीज़ें भी सही लगने लगती हैं। इससे पहले हम अपनी किस्मत और भगवान से लड़ रहे होते हैं - मुझे यह नहीं मिला, मुझे यह नहीं दिया। अब भगवान भी थोड़ा सही लगने लगता है। ध्यान में आने के बाद हम जानते हैं कि सब सही चल रहा है। अगर ध्यान में नहीं आए तो आखिरी साँस तक "मेरा जीवन ही खराब है," ऐसा सोचते हैं।

सिद्धांत व प्रयोग (Theory & Practical)

दोस्तो ! हम सभी को यह याद रखना है भौतिक विज्ञान सभी के लिए आवश्यक है। उससे भी  ज्यादा आवश्यक है आध्यात्मिक विज्ञान। सैद्धांतिक रूप में आध्यात्मिकता को जानना सभी के लिए ज़रूरी है। ध्यान प्रायोगिक भाग है और अभ्यास से ध्यान को अनुभव के रूप में लेकर आना है। इस जन्म में आध्यात्मिकता का सिद्धांत पूरी तरह जानो । ध्यान के प्रयोग द्वारा मैं अपने सभी प्रमुख जन्म देख चुका हूँ। 1976 में मैंने ध्यान में प्रवेश किया। 1979 में मेरा ध्यान परिपक्व हुआ। एक तरह से जैसे एक कच्चा फल पक गया हो। 1979 तक मैं अपने बारे में पूरी तरह जान चुका था।

अपने जीवन की रूपरेखा को मैंने खुद तय किया

मैं बहुत सारे जन्म ले चुका हूँ। पिछले छ्ह जन्मों से मैं ध्यान का प्रचार कर रहा हूँ। पिछले जन्मों में मैं आध्यात्मिक शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में रहा। इस बार का जन्म मैंने पूरी दुनिया को एक करने के लिए लिया है। यह सब कुछ मैंने जाना है-ध्यान के माध्यम से। पूरी दुनिया को मांसाहार से मुक्ति दिलाने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ। सबको आध्यात्मिक विज्ञान (Spiritual Science) का ज्ञान देने आया हूँ। 2095 तक इस शरीर के साथ रहूँगा। यह सब कुछ मेरे जीवन की रूपरेखा है।

पहले हम एक रूपरेखा ( Blue Print ) बनाते हैं। हम पैदा होने से पहले ही, कहाँ पैदा होना है, किसके गर्भ से पैदा होना है, तय कर लेते हैं। हम किस माता-पिता को चुनते हैं, उनका कब आपस में संबंध होगा और हम गर्भ में प्रवेश करेंगे, यह सब पहले से ही तय रहता है।

मेरी योजना थी कि पूरा विज्ञान पढूँगा क्योंकि वैज्ञानिक बनना है ना! आध्यात्मिक विज्ञान में मास्टर होना है ना! उसके बाद की योजना थी कि आयकर-निरीक्षक ( Income Tax Inspector ) के रूप में रहूँगा क्योंकि खुद की जाँच करनी है ना! पैसे के लिए झुकना नहीं है ना! इसके बाद की योजना थी उर्वरक कंपनी से जुड़्ना, क्योंकि जगह-जगह घूमना सीखना था। घूमना मेरे अनुभव में लाना है ना! सभी किसानों के साथ, लोगों के साथ बात करने का तरीका आना चाहिए ना! उत्तरोत्तर ध्यान प्रचार बढ़ाना है ना! उर्वरक कंपनी में जाऊँगा, एक मित्र मिलेगा, वह मुझको ध्यान करना सिखाएगा। उसके बाद उस ध्यान को मैं गाँव-गाँव, शहर-शहर फैलाऊँगा। उसके बाद मैं सभी को आध्यात्मिक शास्त्र के बारे में बताऊँगा। यह सब कुछ मेरी जीवन योजना है।

एक गाना गाने के लिए इतनी सारी योजनाएँ बनानी पड़ती हैं तो पैदा होने से पहले कितनी बड़ी योजना लेकर आ सकते हैं!

मैं बचपन से बहुत सारी किताबें पढ़कर ज्ञानयोगी बन गया। संगीत सीखकर नादयोगी बन गया। अच्छे काम करके कर्मयोगी बन गया। लेकिन ध्यान के बारे में पता नहीं था। तब तक मैंने मंत्र के बारे में आसन के बारे में ही सीखा था, लेकिन इससे सम्पूर्ण ज्ञान नहीं आया। इसके बाद मेरे मित्र श्रीराम चन्ना रेड्डी ने आनापानसति ध्यान से मिलाया। तबसे सब कुछ बदल गया।

रिश्वत देकर ध्यान

तबसे मैं नौकरी करते हुए भी, हरेक को सिखाता "ध्यान करो, साँस पर ध्यान रखो।" उन दिनों मैं बहुत सिगरेट पीता था। मैं सबको बुलाता था और कहता कि मैं तुम्हें सिगरेट का पैकेट दूँगा, ध्यान करो। किसी-किसी को लालच देता कि उन्हें स्कूटर चलाना सिखाऊँगा पर पहले ध्यान करो। किसी को कहता टेनिस खेलना सिखाऊँगा, ध्यान करो। इस तरह ध्यान सिखाने के लिए लोगों को रिश्वत देता था। इस तरह एक-एक व्यक्ति को पकड़-पकड़ कर मैं ध्यान में लाया।

घर पर सब्ज़ियाँ बेचने जो सब्ज़ी वाली आती थी उससे पूछा कि उसकी टोकरी में जितनी सब्ज़ियाँ हैं वह पूरी कितने की होंगी? उसने कहा सौ रूपये की। इस पर मैंने उसे कहा  मैं सौ रूपया देता हूँ, एक घंटा बैठ्कर ध्यान करो। उस औरत को यह समझ नहीं आया कि यह कोई पागल है या कोई मानसिक रोग से पीड़ित है। मैं उसे डराता, अगर बीच में आँखें खोली तो एक पैसा भी नहीं दूँगा।

एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बस पकड़ने जब बस स्टैंड जाता तो उस बस स्टैंड में चने बेचने वाले को पूछता था कि सारा चना बेचने के बाद उसे कहता,"बस आने में अभी एक घंटा बाकी है, तुम्हें मैं 15 रूपये दूँगा, तुम एक घंटा ध्यान में बैठो।"

इस तरह से मेरा ध्यान का सफ़र शुरू हुआ जो यहाँ तक आ पहुँचा है। मेरे जीजाजी और दीदी दसियों साल से अमेरिका में रह रहे हैं। मेरी पढ़ाई के समय से ही मेरे जीजाजी मुझे अमेरिका में आकर पढ़ने के लिए कहते थे। उनका मानना था, इससे मुझे अच्छी नौकरी मिलेगी और मैं ज़्यादा पैसा कमाऊँगा। लेकिन मुझे सत्य की प्यास थी और उसे फैलाना था। अपने देश को छोड़कर जाना मुझे पसंद नहीं था। अब मेरे जीजाजी भारत वापस आकर मेरी तारीफ़ करते हैं कि "तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो, दुनिया के सभी व्यक्तियों को एक कर रहे हो।"

पिछले जन्म

इस जन्म में एक हिन्दू ब्राह्मण के घर में जन्मा हूँ। पिछले जन्म में मैं एक मुस्लिम सूफी संत था | नाम था हज़रत इनायत ख़ान। उस जन्म में मैं सबको आध्यात्मिकता सिखाता रहता था, सितार भी अच्छा बजाता था। उससे पहले उड़ीसा में एक पुजारी के रूप में जन्म लिया जो पर्दे के पीछे से सबको ध्यान करना सिखाता था। और पीछे जाएँ तो अमेरिका में एक जन्म लिया था-नाम था बैंजमिन फैंकलिन, काफ़ी बड़े काम किए थे।

जो हम जानते हैं हम वही करते हैं

10  हज़ार आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा लिखी 50 हजार किताबें मैंने पढ़ी हैं। इस धरती पर अगर किसी ने ध्यान करके अपने अनुभवों के आधार पर किताब लिखी है तो उस किताब को मैं ज़रूर पढ़ता हूँ।

जब मैं नौकरी करता था, पाँच हज़ार रुपये हाथ में आने पर उसमें से दो हज़ार रुपयों की मैं किताबें खरीदता था। बाकी के तीन हज़ार रुपये घर में खर्च के लिए देता था। रविवार को मैं थैला लेकर दुकान जाता था, थैला भरकर किताबें खरीदकर लाता था। मैं एक आध्यात्मिक शास्त्रज्ञ हुँ, ध्यानविद्या सबको सिखाने आया हूँ। जिस काम को हम जानते हैं हम वही करते हैं।

ध्यान के द्वारा ही भाग्यवान

मैंने ध्यान किया है इसी वजह से इस जगह (नरसापुर) आया हूँ। अभी मेरे साथ लाखों लोग निरंतर ध्यान अभ्यास और ध्यान प्रचार के मार्ग पर चल रहे हैं। किसलिए मेरी इतनी इज़्ज़त है? क्यों मैं इतना भाग्यवान हूँ? क्योंकि मैंने ध्यान किया। मेरी जेब में एक पैसा नहीं रहता फिर भी पूरी दुनिया घूम कर आ रहा हूँ। हज़ारों घरों में मैंने खाना खाया है। मैं किसी के भी घर में सो जाता हूँ। सब घर मेरे हैं। यह सब मुझे ध्यान से मिला है। आप भी ध्यान कीजिए और सभी को सिखाइए। यह सब कुछ आपको भी मिलेगा।

अपने जीवन की योजना स्वयं तैयार करना तथा निरन्तर ध्यान प्रचार 

(नरसापुर में पत्रीजी द्वारा दिए गए प्रवचन के अंश)

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